नमस्कार मित्रों,
स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है-: यदि आप स्वयं से बाते नहीं करते तो आप दुनिया के सबसे अच्छे व्यक्ति को नजरअंदाज कर रहे हैं। यह पंक्तियां यथार्थ सत्य हैं।
हम खुद को नजरअंदाज करके कभी जीवन में वह मुकाम हासिल नहीं कर सकते जो हमने सोचा है। इसी क्रम में मेरी आज की पोस्ट इसी प्रकरण पर आधारित है जिसका शीर्षक है-: सवाल-जवाब: खुद से!
मेरे पास एक सार्वजनिक प्रश्न है जिसे हर व्यक्ति को खुद से पूछना चाहिए और स्वयं के अनुकूल उस प्रश्न का उत्तर भी ढूंढने का प्रयास करना चाहिए। वह प्रश्न है मुझे जीवन में क्या चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर अलग-अलग लोगों के परिप्रेक्ष्य में अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन ज्यादातर लोगों का उत्तर होगा पावर और पैसा। कुछ व्यक्ति पैसा और पावर के साथ-साथ मानसिक और आध्यात्मिक शांति को भी इस उत्तर के क्रम में शामिल करेंगे । अब आप खुद सोचिए आपके पास पैसा है, पावर है लेकिन शांति नहीं तो क्या आप खुश रह पाएंगे। बिल्कुल नहीं! तो फिर मानसिक शांति प्राप्त करने का क्या उपाय है?
हम भौतिक सुखों को प्राप्त करने को इतने लालायित रहते हैं कि हमें अपने अंदर झांकने का मौका ही नहीं मिलता ।या फिर हम खुद को समझने का कष्ट उठाना ही नहीं चाहते ?अगर हम लगातार मानसिक शांति के साथ उन्नति करना चाहते हैं तो हमें एक ऐसे गुण को अपने अंदर समाहित करना चाहिए जिसके बिना मनुष्य का उत्थान संभव नहीं है। वह गुण चारित्रिक पवित्रता कहा जाता है। जब चरित्र पवित्र होता है तो हमें अपने जीवन में जो कुछ प्राप्त होता है वह स्थाई होता है चाहे वह पावर हो या पैसा चाहे वह रिश्ते हो या आपका समाज। चारित्रिक विशेषता हमें किसी के समक्ष झुकने को विवश नहीं करती यह हमारे रक्त में सत्यता का परिसंचरण करने के साथ भय का परित्याग करती है इसलिए हमें जीवन में कभी पतन का सामना नहीं करना पड़ता और अगर कभी ऐसी स्थिति आती भी है तो एक न एक दिन सत्य ऊपर उठकर खुद-ब-खुद लोगों के सामने आ जाता है। चरित्र केवल एक शब्द से परिभाषित नहीं होता। इसमें वह सारे गुण शामिल हैं जो एक इंसान को इंसान कहलाने योग्य बनाते हैं । चरित्रवान व्यक्ति वहीं नहीं है जो अपनी कामवासना पर नियंत्रण रखता है। चरित्रवान व्यक्ति में अन्य गुड़ भी शामिल होने चाहिए जो इस प्रकार हैं -:
- दूसरों की निंदा करने से बचें
- महिलाओं का सम्मान करें
-आत्म नियंत्रण
-मितभाषी
-आत्मनिष्ठा
- ईश्वरीय भक्ति
-स्वार्थ रहित सेवा
अब प्रश्न यह उठता है की चरित्र पवित्रता से होने वाले लाभ क्या हैं ? चरित्र मनुष्य की सर्वोपरि संपत्ति है। विचारको का मत है -:धन चला गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य चला गया तो कुछ गया ,लेकिन अगर एक बार चरित्र चला गया तो सब कुछ चला गया। यथार्थ में चरित्रवान रही है जो अपनी आत्मा, परमात्मा व समाज की दृष्टि में समान रूप से चरित्रवान हो। ध्यान रखिएगा आपके पास कितनी भी धन संपत्ति हो,कितना भी आपके पास पावर हो। लेकिन आप चरित्रवान नहीं है तो आपको यह सब होते हुए भी शांति प्राप्त नहीं हो सकती। तब आपका पैसा और पावर किसी काम का नहीं यह सारी सुविधाएं अस्थाई रहेंगी। कभी भी इन का पतन हो सकता है जब हमारा चरित्र पवित्र होता है तो हमें
-सत्य के साथ खड़े होने की हिम्मत मिलती है
- गलत को नकारने की क्षमता का विकास होता है
- पतन का भय समाप्त होता है
- शरीर में स्फूर्ति और चेहरा तेजवान बनता है
- मानसिक और आध्यात्मिक शांति मिलती है
अब हमें चरित्रवान होने के लाभ तो पता चल गए। अब सवाल यह उठता है कि अपने चरित्र को पवित्र कैसे रखा जाए?
आचार्य चाणक्य ने कहा है -:"अपने विचारों को वश में रखो क्योंकि यही तुम्हारी वाणी बनते हैं, अपनी वाणी को वश में रखो क्योंकि यही तुम्हारे कर्म बनते हैं, अपने कर्मों को वश में रखो क्योंकि यही तुम्हारी आदत बनते हैं, और अपनी आदतों को वश में रखो यही तुम्हारा संस्कार बनते हैं, और हमारे संस्कार से ही हमारे चरित्र का निर्माण होता है।
आचार्य चाणक्य की यह बातें यथार्थ सत्य हैं। क्योंकि जो हम देखते और सुनते हैं वही हमारे विचारों का रुप ले लेते हैं और जो हमारे विचार होते हैं उसी अनुरूप हम पुनः चीजों को देखने का सुनने का प्रयत्न करते हैं और फिर यही क्रम निरंतर चलता रहता है ।इसलिए हमें अच्छा सुनना चाहिए अच्छा देखना चाहिए अच्छे लोगों के साथ रहना चाहिए जिससे हम अपने चरित्र को मजबूत और दृढ़ बना सकें। रामायण में एक प्रसंग आता है जब रावण माता सीता को छल से हर ले जाता है ।तब भगवान राम और लक्ष्मण माता सीता को खोजते खोजते वानर राज सुग्रीव के पास पहुंचते हैं। महाराज सुग्रीव को जो माता सीता के गहने प्राप्त होते हैं। वह उन गहनों को भगवान श्रीराम को सौंप देते हैं। श्रीराम उन गहनों में से कर्ण कुंडल अपने भ्राता लक्ष्मण को दिखाते हुए पूछते है-: भ्राता लक्ष्मण! देखो यह करण कुंडल सीता के ही हैं ना? इसपर लक्ष्मण जी जो जवाब देते हैं वह सुनकर मैं स्तब्ध रह गया उन्होंने कहा-" भ्राता श्री! माफ करना मुझे। मैंने कभी माता सीता के मुख की और देखा भी नहीं।अतः मैं इन करण कुंडलो को पहचानने में असमर्थथ हूं । लेकिन हां! मैया सीता की चरण वंदना करते समय मैंने पायलों को देखा है ।अतः मैं इन पायलों को पहचान रहा हूं जो सीता मैया की ही हैं ।
सच में ऐसी पवित्रता अगर साधारण इंसान में आ जाए तो वह भी महानता के पथ पर अग्रसर हो सकता है हम भगवान लक्ष्मण तो नहीं बन सकते लेकिन उनके जीवन चरित्र से मिलने वाली सीख को हम अपने जीवन में आत्मसात करने का प्रयास तो कर सकते हैं। भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-" सत्पुरुष और चरित्रवान व्यक्ति पृथ्वी से कभी नहीं जाते।" बुरे व्यक्ति तूफान की तरह होते हैं आते हैं और चले जाते हैं लेकिन अच्छे व्यक्ति हवा की तरह होते हैं जो मंद गति से चलते हैं ।और मानव जीवन में एक नई ऊर्जा का संचार करते हैं और जीवन पर्यंत विद्यमान रहते हैं।
उम्मीद है आपको मेरा लेख पसंद आया होगा आप चरित्र को कैसे परिभाषित करते हैं या आप मेरे लेख के बारे में क्या सोचते हैं ?कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं और मेरे ब्लॉग(apni vaani) को सब्सक्राइब करें जिससे मेरे द्वारा लिखे गए लेख आसानी से उपलब्ध हो सके.
धन्यवाद !जय हिंद जय भारत ।
स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है-: यदि आप स्वयं से बाते नहीं करते तो आप दुनिया के सबसे अच्छे व्यक्ति को नजरअंदाज कर रहे हैं। यह पंक्तियां यथार्थ सत्य हैं।
हम खुद को नजरअंदाज करके कभी जीवन में वह मुकाम हासिल नहीं कर सकते जो हमने सोचा है। इसी क्रम में मेरी आज की पोस्ट इसी प्रकरण पर आधारित है जिसका शीर्षक है-: सवाल-जवाब: खुद से!
मेरे पास एक सार्वजनिक प्रश्न है जिसे हर व्यक्ति को खुद से पूछना चाहिए और स्वयं के अनुकूल उस प्रश्न का उत्तर भी ढूंढने का प्रयास करना चाहिए। वह प्रश्न है मुझे जीवन में क्या चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर अलग-अलग लोगों के परिप्रेक्ष्य में अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन ज्यादातर लोगों का उत्तर होगा पावर और पैसा। कुछ व्यक्ति पैसा और पावर के साथ-साथ मानसिक और आध्यात्मिक शांति को भी इस उत्तर के क्रम में शामिल करेंगे । अब आप खुद सोचिए आपके पास पैसा है, पावर है लेकिन शांति नहीं तो क्या आप खुश रह पाएंगे। बिल्कुल नहीं! तो फिर मानसिक शांति प्राप्त करने का क्या उपाय है?
हम भौतिक सुखों को प्राप्त करने को इतने लालायित रहते हैं कि हमें अपने अंदर झांकने का मौका ही नहीं मिलता ।या फिर हम खुद को समझने का कष्ट उठाना ही नहीं चाहते ?अगर हम लगातार मानसिक शांति के साथ उन्नति करना चाहते हैं तो हमें एक ऐसे गुण को अपने अंदर समाहित करना चाहिए जिसके बिना मनुष्य का उत्थान संभव नहीं है। वह गुण चारित्रिक पवित्रता कहा जाता है। जब चरित्र पवित्र होता है तो हमें अपने जीवन में जो कुछ प्राप्त होता है वह स्थाई होता है चाहे वह पावर हो या पैसा चाहे वह रिश्ते हो या आपका समाज। चारित्रिक विशेषता हमें किसी के समक्ष झुकने को विवश नहीं करती यह हमारे रक्त में सत्यता का परिसंचरण करने के साथ भय का परित्याग करती है इसलिए हमें जीवन में कभी पतन का सामना नहीं करना पड़ता और अगर कभी ऐसी स्थिति आती भी है तो एक न एक दिन सत्य ऊपर उठकर खुद-ब-खुद लोगों के सामने आ जाता है। चरित्र केवल एक शब्द से परिभाषित नहीं होता। इसमें वह सारे गुण शामिल हैं जो एक इंसान को इंसान कहलाने योग्य बनाते हैं । चरित्रवान व्यक्ति वहीं नहीं है जो अपनी कामवासना पर नियंत्रण रखता है। चरित्रवान व्यक्ति में अन्य गुड़ भी शामिल होने चाहिए जो इस प्रकार हैं -:
- दूसरों की निंदा करने से बचें
- महिलाओं का सम्मान करें
-आत्म नियंत्रण
-मितभाषी
-आत्मनिष्ठा
- ईश्वरीय भक्ति
-स्वार्थ रहित सेवा
अब प्रश्न यह उठता है की चरित्र पवित्रता से होने वाले लाभ क्या हैं ? चरित्र मनुष्य की सर्वोपरि संपत्ति है। विचारको का मत है -:धन चला गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य चला गया तो कुछ गया ,लेकिन अगर एक बार चरित्र चला गया तो सब कुछ चला गया। यथार्थ में चरित्रवान रही है जो अपनी आत्मा, परमात्मा व समाज की दृष्टि में समान रूप से चरित्रवान हो। ध्यान रखिएगा आपके पास कितनी भी धन संपत्ति हो,कितना भी आपके पास पावर हो। लेकिन आप चरित्रवान नहीं है तो आपको यह सब होते हुए भी शांति प्राप्त नहीं हो सकती। तब आपका पैसा और पावर किसी काम का नहीं यह सारी सुविधाएं अस्थाई रहेंगी। कभी भी इन का पतन हो सकता है जब हमारा चरित्र पवित्र होता है तो हमें
-सत्य के साथ खड़े होने की हिम्मत मिलती है
- गलत को नकारने की क्षमता का विकास होता है
- पतन का भय समाप्त होता है
- शरीर में स्फूर्ति और चेहरा तेजवान बनता है
- मानसिक और आध्यात्मिक शांति मिलती है
अब हमें चरित्रवान होने के लाभ तो पता चल गए। अब सवाल यह उठता है कि अपने चरित्र को पवित्र कैसे रखा जाए?
आचार्य चाणक्य ने कहा है -:"अपने विचारों को वश में रखो क्योंकि यही तुम्हारी वाणी बनते हैं, अपनी वाणी को वश में रखो क्योंकि यही तुम्हारे कर्म बनते हैं, अपने कर्मों को वश में रखो क्योंकि यही तुम्हारी आदत बनते हैं, और अपनी आदतों को वश में रखो यही तुम्हारा संस्कार बनते हैं, और हमारे संस्कार से ही हमारे चरित्र का निर्माण होता है।
आचार्य चाणक्य की यह बातें यथार्थ सत्य हैं। क्योंकि जो हम देखते और सुनते हैं वही हमारे विचारों का रुप ले लेते हैं और जो हमारे विचार होते हैं उसी अनुरूप हम पुनः चीजों को देखने का सुनने का प्रयत्न करते हैं और फिर यही क्रम निरंतर चलता रहता है ।इसलिए हमें अच्छा सुनना चाहिए अच्छा देखना चाहिए अच्छे लोगों के साथ रहना चाहिए जिससे हम अपने चरित्र को मजबूत और दृढ़ बना सकें। रामायण में एक प्रसंग आता है जब रावण माता सीता को छल से हर ले जाता है ।तब भगवान राम और लक्ष्मण माता सीता को खोजते खोजते वानर राज सुग्रीव के पास पहुंचते हैं। महाराज सुग्रीव को जो माता सीता के गहने प्राप्त होते हैं। वह उन गहनों को भगवान श्रीराम को सौंप देते हैं। श्रीराम उन गहनों में से कर्ण कुंडल अपने भ्राता लक्ष्मण को दिखाते हुए पूछते है-: भ्राता लक्ष्मण! देखो यह करण कुंडल सीता के ही हैं ना? इसपर लक्ष्मण जी जो जवाब देते हैं वह सुनकर मैं स्तब्ध रह गया उन्होंने कहा-" भ्राता श्री! माफ करना मुझे। मैंने कभी माता सीता के मुख की और देखा भी नहीं।अतः मैं इन करण कुंडलो को पहचानने में असमर्थथ हूं । लेकिन हां! मैया सीता की चरण वंदना करते समय मैंने पायलों को देखा है ।अतः मैं इन पायलों को पहचान रहा हूं जो सीता मैया की ही हैं ।
सच में ऐसी पवित्रता अगर साधारण इंसान में आ जाए तो वह भी महानता के पथ पर अग्रसर हो सकता है हम भगवान लक्ष्मण तो नहीं बन सकते लेकिन उनके जीवन चरित्र से मिलने वाली सीख को हम अपने जीवन में आत्मसात करने का प्रयास तो कर सकते हैं। भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-" सत्पुरुष और चरित्रवान व्यक्ति पृथ्वी से कभी नहीं जाते।" बुरे व्यक्ति तूफान की तरह होते हैं आते हैं और चले जाते हैं लेकिन अच्छे व्यक्ति हवा की तरह होते हैं जो मंद गति से चलते हैं ।और मानव जीवन में एक नई ऊर्जा का संचार करते हैं और जीवन पर्यंत विद्यमान रहते हैं।
उम्मीद है आपको मेरा लेख पसंद आया होगा आप चरित्र को कैसे परिभाषित करते हैं या आप मेरे लेख के बारे में क्या सोचते हैं ?कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं और मेरे ब्लॉग(apni vaani) को सब्सक्राइब करें जिससे मेरे द्वारा लिखे गए लेख आसानी से उपलब्ध हो सके.
धन्यवाद !जय हिंद जय भारत ।

Jay hind
ReplyDeleteजय हिंद
DeleteBahut sundar lekh likha hai
ReplyDeleteThank u
DeleteAse hi aur lekh likhe jaen
ReplyDeleteJi bilkul
DeleteWaah ..nice
ReplyDeleteAti Sundar
ReplyDeleteTilte is good and your explanation told us the importance of interacting with ourselves.Keep it up
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